इस आबाद शहर में
सभी इंतज़ार में हैं
सब तेरे इंतज़ार में हैं
तू किसके इंतज़ार में है...
- रुचि शुक्ला
कुछ गुस्ताखियाँ हुईं, कि लब्ज़ शायरी बन गए, यूँ पेश-ए-खिदमत हो गए, ये नजराने हमारे। -रुचि शुक्ला
वो तेरे पास है
तो न समझ ज़द में है
कुछ रहमत ख़ुदा की
कुछ दुआएँ अपनों की रही होंगी
थाल तो सब सजाते हैं मेहनत से
पर हर निवाले का
अपना नसीब होता है..
- रुचि शुक्ला
यूँ ही जतन करते रहो
कोशिशें कब ज़ाया होती हैं
गुज़रते राहगीरों की
दुआएँ भी क़ुबूल होती हैं..
रुचि शुक्ला
वो बिछ गए थे राहों में
नजर-ए-इनायत होंगे
कुछ रौंद कर चले गए
कुछ ने बुहार दिया कूड़े की तरह...
- रुचि शुक्ला
जाने दो कसूर उनका नहीं
ये दिल हमारा
बाहर से कहाँ दिखता है
किसी चमन में लगा गुलाब नहीं है
जो नज़र-ए-इनायत हो जाता।
-रुचि शुक्ला
ये इल्म तो था उसको
न हमने कभी बयाँ किया
न ज़िक्र उसने ही किया कभी
बात युहीं होती रही
और उम्र गुज़र गई...
-रुचि शुक्ला
वैसे तो हम
आसमा से चाँद उतार लाते
क्या करें फिक्र जमाने की है
कहीं हर रात ही अमावस न हो जाए..
रुचि शुक्ला
ये नज़दीकियाँ तब तलक मुनासिब समझ जो गिरह खोलने की गुंजाइश रहे रूठना मनाना सब ठीक है पर बात करने की गुंजाइश रहे ये तकरार साथ रहने तक हैं जो अल...