यूँ धान से बिरयानी नहीं बनती
किसी ने शिद्दत से पसीना बहाया होगा
माया हाथों की कहने वालों
तजुर्बे ने कुछ तो कमाल दिखाया होगा
-रुचि शुक्ला
कुछ गुस्ताखियाँ हुईं, कि लब्ज़ शायरी बन गए, यूँ पेश-ए-खिदमत हो गए, ये नजराने हमारे। -रुचि शुक्ला
यूँ धान से बिरयानी नहीं बनती
किसी ने शिद्दत से पसीना बहाया होगा
माया हाथों की कहने वालों
तजुर्बे ने कुछ तो कमाल दिखाया होगा
-रुचि शुक्ला
पका के खीर कब-तलक खिलाओगे
सीरा बनाने का तजुर्बा तो लेने दो
सब ठीक करने से बेहतर है
कुछ उन्हें खुद भी सुधरने दो....
-रुचि शुक्ला
सब कुछ याद रखना ये जरूरी नहीं
कुछ भूल भी जाना बेहतरी के लिये
इन यादों में कुछ गुदगुदी और तज़ुर्बे रहें
यही काफी है ज़िंदगी के लिये......
रुचि शुक्ला...
ये नज़दीकियाँ तब तलक मुनासिब समझ जो गिरह खोलने की गुंजाइश रहे रूठना मनाना सब ठीक है पर बात करने की गुंजाइश रहे ये तकरार साथ रहने तक हैं जो अल...