चलो अच्छा है, अब घड़ी परेशां नहीं करती
बड़ी फुर्सत से, अपने-अपनों से हम मिलते हैं
वरना इस भीड़ में भी, तन्हाइयत थी
चंद खास, अब फिर अपने हो गए हैं...
रुचि शुक्ला
कुछ गुस्ताखियाँ हुईं, कि लब्ज़ शायरी बन गए, यूँ पेश-ए-खिदमत हो गए, ये नजराने हमारे। -रुचि शुक्ला
चलो अच्छा है, अब घड़ी परेशां नहीं करती
बड़ी फुर्सत से, अपने-अपनों से हम मिलते हैं
वरना इस भीड़ में भी, तन्हाइयत थी
चंद खास, अब फिर अपने हो गए हैं...
रुचि शुक्ला
जबसे नजदीकियाँ हुईं वो रंगत नहीं रही
मोहब्बत की ख़ुमारी किसी और को होगी
एक अर्सा हुआ हकीकत झेलते हुए..
-रुचि शुक्ला
ये नज़दीकियाँ तब तलक मुनासिब समझ जो गिरह खोलने की गुंजाइश रहे रूठना मनाना सब ठीक है पर बात करने की गुंजाइश रहे ये तकरार साथ रहने तक हैं जो अल...