Monday, 26 December 2022

चंद खास, अब फिर अपने हो गए हैं

 


चलो अच्छा है, अब घड़ी परेशां नहीं करती

बड़ी फुर्सत से, अपने-अपनों से हम मिलते हैं

वरना इस भीड़ में भी, तन्हाइयत थी

चंद खास, अब फिर अपने हो गए हैं...

                                  रुचि शुक्ला

Sunday, 18 December 2022

एक अर्सा हुआ हकीकत झेलते हुए


चाँद दूर से मदहोश करता था

जबसे नजदीकियाँ हुईं वो रंगत नहीं रही

मोहब्बत की ख़ुमारी किसी और को होगी

एक अर्सा हुआ हकीकत झेलते हुए..

                               -रुचि शुक्ला


जो अलग हो गए तो कैसी झड़प

ये नज़दीकियाँ तब तलक मुनासिब समझ जो गिरह खोलने की गुंजाइश रहे रूठना मनाना सब ठीक है पर बात करने की गुंजाइश रहे ये तकरार साथ रहने तक हैं जो अल...