चाँद दूर से मदहोश करता था
जबसे नजदीकियाँ हुईं वो रंगत नहीं रही
मोहब्बत की ख़ुमारी किसी और को होगी
एक अर्सा हुआ हकीकत झेलते हुए..
-रुचि शुक्ला
कुछ गुस्ताखियाँ हुईं, कि लब्ज़ शायरी बन गए, यूँ पेश-ए-खिदमत हो गए, ये नजराने हमारे। -रुचि शुक्ला
ये नज़दीकियाँ तब तलक मुनासिब समझ जो गिरह खोलने की गुंजाइश रहे रूठना मनाना सब ठीक है पर बात करने की गुंजाइश रहे ये तकरार साथ रहने तक हैं जो अल...
No comments:
Post a Comment