उलझन में फंदा डाल, कब कितनी ढील देना है
बेहतरीन कशीदगी हुनरमंद का काम है
माना कि क़ाबिल बहुतेरे होंगे,
डूबती कश्ती को किनारे लाए
खेवय्या कोई ख़ास दमदार ही होगा...
रुचि शुक्ला
कुछ गुस्ताखियाँ हुईं, कि लब्ज़ शायरी बन गए, यूँ पेश-ए-खिदमत हो गए, ये नजराने हमारे। -रुचि शुक्ला
उलझन में फंदा डाल, कब कितनी ढील देना है
बेहतरीन कशीदगी हुनरमंद का काम है
माना कि क़ाबिल बहुतेरे होंगे,
डूबती कश्ती को किनारे लाए
खेवय्या कोई ख़ास दमदार ही होगा...
रुचि शुक्ला
ये नज़दीकियाँ तब तलक मुनासिब समझ जो गिरह खोलने की गुंजाइश रहे रूठना मनाना सब ठीक है पर बात करने की गुंजाइश रहे ये तकरार साथ रहने तक हैं जो अल...