तड़कती धूप से राह में दरार थीं
उसका साथ पर प्यार की बयार सा था
वो थी तो आसां हुए ये कदम
और साथ जीने की तमन्ना भी की...
- रुचि शुक्ला
कुछ गुस्ताखियाँ हुईं, कि लब्ज़ शायरी बन गए, यूँ पेश-ए-खिदमत हो गए, ये नजराने हमारे। -रुचि शुक्ला
तड़कती धूप से राह में दरार थीं
उसका साथ पर प्यार की बयार सा था
वो थी तो आसां हुए ये कदम
और साथ जीने की तमन्ना भी की...
- रुचि शुक्ला
ये नज़दीकियाँ तब तलक मुनासिब समझ जो गिरह खोलने की गुंजाइश रहे रूठना मनाना सब ठीक है पर बात करने की गुंजाइश रहे ये तकरार साथ रहने तक हैं जो अल...