Monday, 18 October 2021

वक्त बदले, इस राह में


कुछ कहा नहीं, कुछ छुपा गए

वक्त का तक़ाज़ा था

सो दबा गए

लगा उन्हें सब ख़ौफ़ में हैं

बात यूँ है कि

वक्त बदले इस राह में

उनके काँख में फंसी तलवार भी है।

                           - रुचि शुक्ला

जो अलग हो गए तो कैसी झड़प

ये नज़दीकियाँ तब तलक मुनासिब समझ जो गिरह खोलने की गुंजाइश रहे रूठना मनाना सब ठीक है पर बात करने की गुंजाइश रहे ये तकरार साथ रहने तक हैं जो अल...