Saturday, 27 March 2021

अंदाज-ए-बयां और था


उसके नसीब का निवाला 

यूँ नहीं ज़ाया हुआ

कुछ हाथ थे

जो नसीबा ही हलक से ले गए

वो कह गए

उसके लिखे का

अंदाज-ए-बयां और था...

                         -रुचि शुक्ला

Friday, 26 March 2021

अक़ीदे तोड़ देते हैं

 


इतने मुतमइन न हो ज़नाब

तुम इन दरख़्तों से बाक़िफ़ नहीं हो

अदावत के बिना भी ये

अक़ीदे तोड़ देते हैं...

                           -रुचि शुक्ला

अब वो खुद आप ही मयस्सर न रहे



हालात ने इस कदर 
बेअसर किया
अब वो खुद आप ही
मयस्सर न रहे..
                         -रुचि शुक्ला

कुछ सुनी नहीं गईं


इस सफ़र के दरमियाँ

कई कहानियाँ गुजरीं

कुछ कही नहीं गईं

कुछ सुनी नहीं गईं...

                          -रुचि शुक्ला

जब ये भी जाने जाएंगे

 


शब्द जिन्दा रहेंगे, 

कब तलक यूँ दबाए जाएँगे

वो वक़्त भी आएगा, 

जब ये भी जाने जाएंगे...  

                     -रुचि शुक्ला 

Monday, 8 March 2021

जब वो पास हों मनाने को

 


गिला करें भी तो क्या, और किससे करें

किसे वक़्त है निभाने को

रूठने का मज़ा तो तब है

जब, वो पास हों मनाने को....

                                 -रुचि शुक्ला

जो अलग हो गए तो कैसी झड़प

ये नज़दीकियाँ तब तलक मुनासिब समझ जो गिरह खोलने की गुंजाइश रहे रूठना मनाना सब ठीक है पर बात करने की गुंजाइश रहे ये तकरार साथ रहने तक हैं जो अल...