Sunday, 6 April 2025

मोहब्बत से मिलेंगे

 


अब सहने की कुब्बत न उन में है

न हम में बाकी है

उनका घर उनके लिए 

और हमारा घर हमारे लिए काफ़ी है

जब भी मिलेंगे तो मोहब्बत से मिलेंगे

बर्दाश्तगी का तकुलुफ़ कब हमने उठाया,

तो उन से क्या उम्मीद करेंगे..

                            - रुचि शुक्ला


Saturday, 5 April 2025

तोहमत दिए जाते हैं


 

वो बच्चों सी खूबियाँ अब कहाँ

मगर बचपना लिए बैठे हैं

उम्र अधेड़ हुई जाती है

और क्या अल्हड़ जवानी है

हाँ..बहुत खूब हैं वो 

गुस्ताखियाँ भी करते हैं 

और तोहमत दिए जाते हैं..

                    - रुचि शुक्ला

जो अलग हो गए तो कैसी झड़प

ये नज़दीकियाँ तब तलक मुनासिब समझ जो गिरह खोलने की गुंजाइश रहे रूठना मनाना सब ठीक है पर बात करने की गुंजाइश रहे ये तकरार साथ रहने तक हैं जो अल...