अब सहने की कुब्बत न उन में है
न हम में बाकी है
उनका घर उनके लिए
और हमारा घर हमारे लिए काफ़ी है
जब भी मिलेंगे तो मोहब्बत से मिलेंगे
बर्दाश्तगी का तकुलुफ़ कब हमने उठाया,
तो उन से क्या उम्मीद करेंगे..
- रुचि शुक्ला
कुछ गुस्ताखियाँ हुईं, कि लब्ज़ शायरी बन गए, यूँ पेश-ए-खिदमत हो गए, ये नजराने हमारे। -रुचि शुक्ला
अब सहने की कुब्बत न उन में है
न हम में बाकी है
उनका घर उनके लिए
और हमारा घर हमारे लिए काफ़ी है
जब भी मिलेंगे तो मोहब्बत से मिलेंगे
बर्दाश्तगी का तकुलुफ़ कब हमने उठाया,
तो उन से क्या उम्मीद करेंगे..
- रुचि शुक्ला
वो बच्चों सी खूबियाँ अब कहाँ
मगर बचपना लिए बैठे हैं
उम्र अधेड़ हुई जाती है
और क्या अल्हड़ जवानी है
हाँ..बहुत खूब हैं वो
गुस्ताखियाँ भी करते हैं
और तोहमत दिए जाते हैं..
ये नज़दीकियाँ तब तलक मुनासिब समझ जो गिरह खोलने की गुंजाइश रहे रूठना मनाना सब ठीक है पर बात करने की गुंजाइश रहे ये तकरार साथ रहने तक हैं जो अल...