वो बच्चों सी खूबियाँ अब कहाँ
मगर बचपना लिए बैठे हैं
उम्र अधेड़ हुई जाती है
और क्या अल्हड़ जवानी है
हाँ..बहुत खूब हैं वो
गुस्ताखियाँ भी करते हैं
और तोहमत दिए जाते हैं..
- रुचि शुक्ला
कुछ गुस्ताखियाँ हुईं, कि लब्ज़ शायरी बन गए, यूँ पेश-ए-खिदमत हो गए, ये नजराने हमारे। -रुचि शुक्ला
ये नज़दीकियाँ तब तलक मुनासिब समझ जो गिरह खोलने की गुंजाइश रहे रूठना मनाना सब ठीक है पर बात करने की गुंजाइश रहे ये तकरार साथ रहने तक हैं जो अल...
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