हवा की मस्तियाँ, आवारगी नहीं
वो मौसम के इशारों पर, सर झुका कर चलती हैं
कहाँ तूफां में दम है अपना रुख़ बदलने का
वो तो किसी और के कहे, किसी ओर चलता है..
- रुचि शुक्ला
कुछ गुस्ताखियाँ हुईं, कि लब्ज़ शायरी बन गए, यूँ पेश-ए-खिदमत हो गए, ये नजराने हमारे। -रुचि शुक्ला
हवा की मस्तियाँ, आवारगी नहीं
वो मौसम के इशारों पर, सर झुका कर चलती हैं
कहाँ तूफां में दम है अपना रुख़ बदलने का
वो तो किसी और के कहे, किसी ओर चलता है..
- रुचि शुक्ला
ये नज़दीकियाँ तब तलक मुनासिब समझ जो गिरह खोलने की गुंजाइश रहे रूठना मनाना सब ठीक है पर बात करने की गुंजाइश रहे ये तकरार साथ रहने तक हैं जो अल...