Wednesday, 28 October 2020

बे-हिस नज़र बड़ी है



खुली किताब के सब, पन्ने पलट रहे हैं

कुछ नया नहीं है, जो आज पढ़ रहे हैं

आलम ये हो चुका के

फूल खिल रहे हैं,  बे-हिस नज़र बड़ी है

बे-रुख़ सी हो खड़ी है........

                           -रुचि शुक्ला

Tuesday, 20 October 2020

एक दिन हमको ही रोना पड़ेगा


घर तोड़ने का बहुत शौख है,

इन आसूँ का हमको मिलेगा सिला।

गुलशन-गुलिस्ताँ है बिखरा पड़ा,

एक दिन हमको ही रोना पड़ेगा... ।

                        -रुचि शुक्ला


Monday, 19 October 2020

साँस चलना भी यूँ गवारा नहीं

 


ये रौनक है, झूठ के महफिलों की ,

मुस्कुराने की ज़हमत तुम्हें क्या पता ।

फ़क़त जान लो, ठहरना है मुश्किल,

साँस चलना भी यूँ गवारा नहीं....।

                         -रुचि शुक्ला

Saturday, 3 October 2020

कोई बेगारी नहीं होती

 


बहुत से ख़्वाब बुनती हूँ,

मैं अकेले में।

ये मेरा इश्क है, 

यहाँ तन्हाई भी तन्हा नहीं रहती।

औरत हूँ, 

अपनी उम्मीदों पर जीती हूँ।

के मेरे काम में, 

कोई बेगारी नहीं होती।

                   -रुचि शुक्ला

Friday, 2 October 2020

चिर नोंचते इन्सान हैं

 


न लफ़्ज़ हैं, न जिरह बची

बस इतना सा मलाल है

कैद में हैं जानवर 

चिर नोंचते इन्सान हैं।

                - रुचि शुक्ला

जो अलग हो गए तो कैसी झड़प

ये नज़दीकियाँ तब तलक मुनासिब समझ जो गिरह खोलने की गुंजाइश रहे रूठना मनाना सब ठीक है पर बात करने की गुंजाइश रहे ये तकरार साथ रहने तक हैं जो अल...