खुली किताब के सब, पन्ने पलट रहे हैं
कुछ नया नहीं है, जो आज पढ़ रहे हैं
आलम ये हो चुका के
फूल खिल रहे हैं, बे-हिस नज़र बड़ी है
बे-रुख़ सी हो खड़ी है........
-रुचि शुक्ला
कुछ गुस्ताखियाँ हुईं, कि लब्ज़ शायरी बन गए, यूँ पेश-ए-खिदमत हो गए, ये नजराने हमारे। -रुचि शुक्ला
खुली किताब के सब, पन्ने पलट रहे हैं
कुछ नया नहीं है, जो आज पढ़ रहे हैं
आलम ये हो चुका के
फूल खिल रहे हैं, बे-हिस नज़र बड़ी है
बे-रुख़ सी हो खड़ी है........
-रुचि शुक्ला
घर तोड़ने का बहुत शौख है,
इन आसूँ का हमको मिलेगा सिला।
गुलशन-गुलिस्ताँ है बिखरा पड़ा,
एक दिन हमको ही रोना पड़ेगा... ।
-रुचि शुक्ला
ये रौनक है, झूठ के महफिलों की ,
मुस्कुराने की ज़हमत तुम्हें क्या पता ।
फ़क़त जान लो, ठहरना है मुश्किल,
साँस चलना भी यूँ गवारा नहीं....।
-रुचि शुक्ला
बहुत से ख़्वाब बुनती हूँ,
मैं अकेले में।
ये मेरा इश्क है,
यहाँ तन्हाई भी तन्हा नहीं रहती।
औरत हूँ,
अपनी उम्मीदों पर जीती हूँ।
के मेरे काम में,
कोई बेगारी नहीं होती।
-रुचि शुक्ला
ये नज़दीकियाँ तब तलक मुनासिब समझ जो गिरह खोलने की गुंजाइश रहे रूठना मनाना सब ठीक है पर बात करने की गुंजाइश रहे ये तकरार साथ रहने तक हैं जो अल...