अनकहे लफ़्ज़ों में अर्थ ढूँढते रहे
काश.. जो कहा, उतना तो सुना होता
ज़िंदगी रेत सी फ़िसलती रही
हम साथ ही चले
वे हमें ख़ोजते रहे....
- रुचि शुक्ला
कुछ गुस्ताखियाँ हुईं, कि लब्ज़ शायरी बन गए, यूँ पेश-ए-खिदमत हो गए, ये नजराने हमारे। -रुचि शुक्ला
काश.. जो कहा, उतना तो सुना होता
ज़िंदगी रेत सी फ़िसलती रही
हम साथ ही चले
वे हमें ख़ोजते रहे....
- रुचि शुक्ला
ये नज़दीकियाँ तब तलक मुनासिब समझ जो गिरह खोलने की गुंजाइश रहे रूठना मनाना सब ठीक है पर बात करने की गुंजाइश रहे ये तकरार साथ रहने तक हैं जो अल...