Thursday, 2 December 2021

वे हमें ख़ोजते रहे..


अनकहे लफ़्ज़ों में अर्थ ढूँढते रहे

काश.. जो कहा, उतना तो सुना होता

ज़िंदगी रेत सी फ़िसलती रही

हम साथ ही चले

वे हमें ख़ोजते रहे....

                  - रुचि शुक्ला

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