Tuesday, 23 April 2024

हवाओं की तरह हमने बदल जाना नहीं सीखा


 

हवाओं की तरह हमने बदल जाना नहीं सीखा

माना जहाँ में वक्तपरस्त लोग कई हैं

दिन आज भी  लेकिन पूरब से निकलता है

दिवाकर ने अपना कभी ईमा नहीं बदला।

                              - रुचि शुक्ला

मेज़ पर बिखरे कई अखबार होते हैं


 

मेज़ पर बिखरे हुए कई अखबार होते हैं

हो लेखनी में दम

तो सरोकार होते हैं

वरना ये बेकार, बेदाम होते हैं।

                           - रुचि शुक्ला

Friday, 12 April 2024

मजबूरियाँ रही होंगी


            

अमायार फ़िजूल ही बबाल करते हो

मेरे यार को ख़ामो खां बदनाम करते हो

तुम्हें क्या पता क्या मजबूरियाँ रही होंगी

क्या यूँ हीं, कोई अपना महबूब बदल लेता है।

                               - रुचि शुक्ला 

जो अलग हो गए तो कैसी झड़प

ये नज़दीकियाँ तब तलक मुनासिब समझ जो गिरह खोलने की गुंजाइश रहे रूठना मनाना सब ठीक है पर बात करने की गुंजाइश रहे ये तकरार साथ रहने तक हैं जो अल...