हवाओं की तरह हमने बदल जाना नहीं सीखा
माना जहाँ में वक्तपरस्त लोग कई हैं
दिन आज भी लेकिन पूरब से निकलता है
दिवाकर ने अपना कभी ईमा नहीं बदला।
- रुचि शुक्ला
कुछ गुस्ताखियाँ हुईं, कि लब्ज़ शायरी बन गए, यूँ पेश-ए-खिदमत हो गए, ये नजराने हमारे। -रुचि शुक्ला
हवाओं की तरह हमने बदल जाना नहीं सीखा
माना जहाँ में वक्तपरस्त लोग कई हैं
दिन आज भी लेकिन पूरब से निकलता है
दिवाकर ने अपना कभी ईमा नहीं बदला।
- रुचि शुक्ला
मेज़ पर बिखरे हुए कई अखबार होते हैं
हो लेखनी में दम
तो सरोकार होते हैं
वरना ये बेकार, बेदाम होते हैं।
अमायार फ़िजूल ही बबाल करते हो
मेरे यार को ख़ामो खां बदनाम करते हो
तुम्हें क्या पता क्या मजबूरियाँ रही होंगी
क्या यूँ हीं, कोई अपना महबूब बदल लेता है।
- रुचि शुक्ला
ये नज़दीकियाँ तब तलक मुनासिब समझ जो गिरह खोलने की गुंजाइश रहे रूठना मनाना सब ठीक है पर बात करने की गुंजाइश रहे ये तकरार साथ रहने तक हैं जो अल...