हवाओं की तरह हमने बदल जाना नहीं सीखा
माना जहाँ में वक्तपरस्त लोग कई हैं
दिन आज भी लेकिन पूरब से निकलता है
दिवाकर ने अपना कभी ईमा नहीं बदला।
- रुचि शुक्ला
कुछ गुस्ताखियाँ हुईं, कि लब्ज़ शायरी बन गए, यूँ पेश-ए-खिदमत हो गए, ये नजराने हमारे। -रुचि शुक्ला
ये नज़दीकियाँ तब तलक मुनासिब समझ जो गिरह खोलने की गुंजाइश रहे रूठना मनाना सब ठीक है पर बात करने की गुंजाइश रहे ये तकरार साथ रहने तक हैं जो अल...
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