जो गिरह खोलने की गुंजाइश रहे
रूठना मनाना सब ठीक है
पर बात करने की गुंजाइश रहे
ये तकरार साथ रहने तक हैं
जो अलग हो गए फिर कैसी झड़प...
- रुचि शुक्ला
कुछ गुस्ताखियाँ हुईं, कि लब्ज़ शायरी बन गए, यूँ पेश-ए-खिदमत हो गए, ये नजराने हमारे। -रुचि शुक्ला
जो गिरह खोलने की गुंजाइश रहे
रूठना मनाना सब ठीक है
पर बात करने की गुंजाइश रहे
ये तकरार साथ रहने तक हैं
जो अलग हो गए फिर कैसी झड़प...
- रुचि शुक्ला
वो तेरे पास है
तो न समझ ज़द में है
कुछ रहमत ख़ुदा की
कुछ दुआएँ अपनों की रही होंगी
थाल तो सब सजाते हैं मेहनत से
पर हर निवाले का
अपना नसीब होता है..
- रुचि शुक्ला
यूँ ही जतन करते रहो
कोशिशें कब ज़ाया होती हैं
गुज़रते राहगीरों की
दुआएँ भी क़ुबूल होती हैं..
रुचि शुक्ला
वो बिछ गए थे राहों में
नजर-ए-इनायत होंगे
कुछ रौंद कर चले गए
कुछ ने बुहार दिया कूड़े की तरह...
- रुचि शुक्ला
ये नज़दीकियाँ तब तलक मुनासिब समझ जो गिरह खोलने की गुंजाइश रहे रूठना मनाना सब ठीक है पर बात करने की गुंजाइश रहे ये तकरार साथ रहने तक हैं जो अल...