इबादत से जब शब्द खिलखिलाते हैं
वही नज़्म बन गुनगुनाए जाते हैं
शोर मचाने से संगीत नहीं बनता
तराने वही हैं, जो रूह को छू जाते हैं।
- रुचि शुक्ला
कुछ गुस्ताखियाँ हुईं, कि लब्ज़ शायरी बन गए, यूँ पेश-ए-खिदमत हो गए, ये नजराने हमारे। -रुचि शुक्ला
इबादत से जब शब्द खिलखिलाते हैं
वही नज़्म बन गुनगुनाए जाते हैं
शोर मचाने से संगीत नहीं बनता
तराने वही हैं, जो रूह को छू जाते हैं।
- रुचि शुक्ला
न बच्चे हैं, न बूढ़े हैं
चालीस पार सयाने हैं
ज़बाँ बेबाक हो कितनी
इसके भी पैमाने हैं
सच कहें या चुप बैठें
ये तो और बात है
मौक़ा देख कर, अब तो
मतलब साध लेते हैं.....
- रुचि शुक्ला
एक इबादत है
जो की नहीं जाती
बस साकार होती है
नए शब्द जेहन में उतरते ही
दिल से, ये आगाज होती है....
- रुचि शुक्ला
ये नज़दीकियाँ तब तलक मुनासिब समझ जो गिरह खोलने की गुंजाइश रहे रूठना मनाना सब ठीक है पर बात करने की गुंजाइश रहे ये तकरार साथ रहने तक हैं जो अल...