न बच्चे हैं, न बूढ़े हैं
चालीस पार सयाने हैं
ज़बाँ बेबाक हो कितनी
इसके भी पैमाने हैं
सच कहें या चुप बैठें
ये तो और बात है
मौक़ा देख कर, अब तो
मतलब साध लेते हैं.....
- रुचि शुक्ला
कुछ गुस्ताखियाँ हुईं, कि लब्ज़ शायरी बन गए, यूँ पेश-ए-खिदमत हो गए, ये नजराने हमारे। -रुचि शुक्ला
ये नज़दीकियाँ तब तलक मुनासिब समझ जो गिरह खोलने की गुंजाइश रहे रूठना मनाना सब ठीक है पर बात करने की गुंजाइश रहे ये तकरार साथ रहने तक हैं जो अल...
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