बरसाने में पिटे कान्हा का इठला के चलना
और कहना, ये लाड़ और प्यार के निशान हैं।
क्या कहें हम, इस इश्क के लुफ़्त को
जहाँ ज़ख्म पर भी मलाल नहीं है।
- रुचि शुक्ला
कुछ गुस्ताखियाँ हुईं, कि लब्ज़ शायरी बन गए, यूँ पेश-ए-खिदमत हो गए, ये नजराने हमारे। -रुचि शुक्ला
बरसाने में पिटे कान्हा का इठला के चलना
और कहना, ये लाड़ और प्यार के निशान हैं।
क्या कहें हम, इस इश्क के लुफ़्त को
जहाँ ज़ख्म पर भी मलाल नहीं है।
- रुचि शुक्ला
ये नज़दीकियाँ तब तलक मुनासिब समझ जो गिरह खोलने की गुंजाइश रहे रूठना मनाना सब ठीक है पर बात करने की गुंजाइश रहे ये तकरार साथ रहने तक हैं जो अल...