Saturday, 12 July 2025

तरकस के तीर

 


तरकस के तीर कमान से, बेवज़ह नहीं छोड़े जाते

और ये बोल तो अनमोल हैं, यूँही नहीं बोले जाते

                                     -रुचि शुक्ला

जो अलग हो गए तो कैसी झड़प

ये नज़दीकियाँ तब तलक मुनासिब समझ जो गिरह खोलने की गुंजाइश रहे रूठना मनाना सब ठीक है पर बात करने की गुंजाइश रहे ये तकरार साथ रहने तक हैं जो अल...