कुछ अँधे, कुछ बहरे
मेरे वतन का नसीब लिखते हैं।
कि अब वो नहीं बचे जो
मिसाल की मिसाल बनते थे...
-रुचि शुक्ला
कुछ गुस्ताखियाँ हुईं, कि लब्ज़ शायरी बन गए, यूँ पेश-ए-खिदमत हो गए, ये नजराने हमारे। -रुचि शुक्ला
कुछ अँधे, कुछ बहरे
मेरे वतन का नसीब लिखते हैं।
कि अब वो नहीं बचे जो
मिसाल की मिसाल बनते थे...
-रुचि शुक्ला
हाथों से कलम छूटे ज़माना गुजरा
कि लफ़्ज़ अब गढ़ने लगे इशारों से
कहने को ये जहाँ इस मुट्ठी में है
पर वक्त गुज़रा उसकी खैरियत जाने..
-रुचि शुक्ला
मेरे जज़्बात शब्दों में न बयाँ होंगे
मेरे बच्चे की पोशाक में चीथड़े बहुत हैं
सब रुख़सत हुए; मेरे ख्वाब यूँ अश्क बन
कि राह में बिखरे हुए शीशे बहुत हैं।
- रुचि शुक्ला
ये नज़दीकियाँ तब तलक मुनासिब समझ जो गिरह खोलने की गुंजाइश रहे रूठना मनाना सब ठीक है पर बात करने की गुंजाइश रहे ये तकरार साथ रहने तक हैं जो अल...