हाथों से कलम छूटे ज़माना गुजरा
कि लफ़्ज़ अब गढ़ने लगे इशारों से
कहने को ये जहाँ इस मुट्ठी में है
पर वक्त गुज़रा उसकी खैरियत जाने..
-रुचि शुक्ला
कुछ गुस्ताखियाँ हुईं, कि लब्ज़ शायरी बन गए, यूँ पेश-ए-खिदमत हो गए, ये नजराने हमारे। -रुचि शुक्ला
ये नज़दीकियाँ तब तलक मुनासिब समझ जो गिरह खोलने की गुंजाइश रहे रूठना मनाना सब ठीक है पर बात करने की गुंजाइश रहे ये तकरार साथ रहने तक हैं जो अल...
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