वो तेरे पास है
तो न समझ ज़द में है
कुछ रहमत ख़ुदा की
कुछ दुआएँ अपनों की रही होंगी
थाल तो सब सजाते हैं मेहनत से
पर हर निवाले का
अपना नसीब होता है..
- रुचि शुक्ला
कुछ गुस्ताखियाँ हुईं, कि लब्ज़ शायरी बन गए, यूँ पेश-ए-खिदमत हो गए, ये नजराने हमारे। -रुचि शुक्ला
ये नज़दीकियाँ तब तलक मुनासिब समझ जो गिरह खोलने की गुंजाइश रहे रूठना मनाना सब ठीक है पर बात करने की गुंजाइश रहे ये तकरार साथ रहने तक हैं जो अल...
No comments:
Post a Comment