अमायार फ़िजूल ही बबाल करते हो
मेरे यार को ख़ामो खां बदनाम करते हो
तुम्हें क्या पता क्या मजबूरियाँ रही होंगी
क्या यूँ हीं, कोई अपना महबूब बदल लेता है।
- रुचि शुक्ला
कुछ गुस्ताखियाँ हुईं, कि लब्ज़ शायरी बन गए, यूँ पेश-ए-खिदमत हो गए, ये नजराने हमारे। -रुचि शुक्ला
ये नज़दीकियाँ तब तलक मुनासिब समझ जो गिरह खोलने की गुंजाइश रहे रूठना मनाना सब ठीक है पर बात करने की गुंजाइश रहे ये तकरार साथ रहने तक हैं जो अल...
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