खुली किताब के सब, पन्ने पलट रहे हैं
कुछ नया नहीं है, जो आज पढ़ रहे हैं
आलम ये हो चुका के
फूल खिल रहे हैं, बे-हिस नज़र बड़ी है
बे-रुख़ सी हो खड़ी है........
-रुचि शुक्ला
कुछ गुस्ताखियाँ हुईं, कि लब्ज़ शायरी बन गए, यूँ पेश-ए-खिदमत हो गए, ये नजराने हमारे। -रुचि शुक्ला
ये नज़दीकियाँ तब तलक मुनासिब समझ जो गिरह खोलने की गुंजाइश रहे रूठना मनाना सब ठीक है पर बात करने की गुंजाइश रहे ये तकरार साथ रहने तक हैं जो अल...
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