Wednesday, 28 October 2020

बे-हिस नज़र बड़ी है



खुली किताब के सब, पन्ने पलट रहे हैं

कुछ नया नहीं है, जो आज पढ़ रहे हैं

आलम ये हो चुका के

फूल खिल रहे हैं,  बे-हिस नज़र बड़ी है

बे-रुख़ सी हो खड़ी है........

                           -रुचि शुक्ला

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