Monday, 19 October 2020

साँस चलना भी यूँ गवारा नहीं

 


ये रौनक है, झूठ के महफिलों की ,

मुस्कुराने की ज़हमत तुम्हें क्या पता ।

फ़क़त जान लो, ठहरना है मुश्किल,

साँस चलना भी यूँ गवारा नहीं....।

                         -रुचि शुक्ला

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