ये रौनक है, झूठ के महफिलों की ,
मुस्कुराने की ज़हमत तुम्हें क्या पता ।
फ़क़त जान लो, ठहरना है मुश्किल,
साँस चलना भी यूँ गवारा नहीं....।
-रुचि शुक्ला
कुछ गुस्ताखियाँ हुईं, कि लब्ज़ शायरी बन गए, यूँ पेश-ए-खिदमत हो गए, ये नजराने हमारे। -रुचि शुक्ला
ये नज़दीकियाँ तब तलक मुनासिब समझ जो गिरह खोलने की गुंजाइश रहे रूठना मनाना सब ठीक है पर बात करने की गुंजाइश रहे ये तकरार साथ रहने तक हैं जो अल...
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