Sunday, 6 April 2025

मोहब्बत से मिलेंगे

 


अब सहने की कुब्बत न उन में है

न हम में बाकी है

उनका घर उनके लिए 

और हमारा घर हमारे लिए काफ़ी है

जब भी मिलेंगे तो मोहब्बत से मिलेंगे

बर्दाश्तगी का तकुलुफ़ कब हमने उठाया,

तो उन से क्या उम्मीद करेंगे..

                            - रुचि शुक्ला


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