दिल में जो बात है
लबों पर ला भी न सका
राज़दाँ वो हो गए
उन्हें राज़-ए-मोहब्बत बता न सका
वो आफ़ताब नहीं, कहीं की हूर भी नहीं
वो मेरे दिल का प्यार है
जिसे मैं भुला न सका
- रुचि शुक्ला
कुछ गुस्ताखियाँ हुईं, कि लब्ज़ शायरी बन गए, यूँ पेश-ए-खिदमत हो गए, ये नजराने हमारे। -रुचि शुक्ला
ये नज़दीकियाँ तब तलक मुनासिब समझ जो गिरह खोलने की गुंजाइश रहे रूठना मनाना सब ठीक है पर बात करने की गुंजाइश रहे ये तकरार साथ रहने तक हैं जो अल...
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