ज़िंदगी ओस नहीं जो यूँहीं फ़िसल जाएगी
साँस वो फाँस नहीं जो यूँहीं निकल जाएगी
उम्र के साथ नए दर्द पिरोना सीखो
अगर मोत भी आ गई तो संभल जाएगी।
- रुचि शुक्ला
कुछ गुस्ताखियाँ हुईं, कि लब्ज़ शायरी बन गए, यूँ पेश-ए-खिदमत हो गए, ये नजराने हमारे। -रुचि शुक्ला
ये नज़दीकियाँ तब तलक मुनासिब समझ जो गिरह खोलने की गुंजाइश रहे रूठना मनाना सब ठीक है पर बात करने की गुंजाइश रहे ये तकरार साथ रहने तक हैं जो अल...
No comments:
Post a Comment