वो गया वक्त जब उनकी कारगुजारियाँ देखीं
अब हमारी राह ही मुख़्तलिफ़ है
वो भले आज भी निशाने लगाते होंगे
उनकी सरहद से दूर, हम इत्मीनान से हैं..
रुचि शुक्ला..
कुछ गुस्ताखियाँ हुईं, कि लब्ज़ शायरी बन गए, यूँ पेश-ए-खिदमत हो गए, ये नजराने हमारे। -रुचि शुक्ला
ये नज़दीकियाँ तब तलक मुनासिब समझ जो गिरह खोलने की गुंजाइश रहे रूठना मनाना सब ठीक है पर बात करने की गुंजाइश रहे ये तकरार साथ रहने तक हैं जो अल...
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