महीनों गुजर गए कोई Sunday नहीं आया...
शायद दफ्तरों में अब छुट्टी नहीं होती
टूटी कुर्सियाँ भी जंग खा रही हैं
सूने घरों की गूँज यूँ दीवारों में कैद है....
- रुचि शुक्ला
कुछ गुस्ताखियाँ हुईं, कि लब्ज़ शायरी बन गए, यूँ पेश-ए-खिदमत हो गए, ये नजराने हमारे। -रुचि शुक्ला
ये नज़दीकियाँ तब तलक मुनासिब समझ जो गिरह खोलने की गुंजाइश रहे रूठना मनाना सब ठीक है पर बात करने की गुंजाइश रहे ये तकरार साथ रहने तक हैं जो अल...
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